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ashutosh

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Friends, I am a person which belongs to typical Hindi reagon of Uttar Pradesh. Love & blesses for everyone, its only desire of me. Shayri, geet, ghazal whenever does come in heart beats, I try to wrote .
Associated tags : ghazals & shayari

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ashutosh's name

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भावनाओ कि निर्मम हत्या से उपजी विचारों की अनुपम अभिव्यक्ति से दुनिया को जो मुर्दा दिखा वही कविता है। सीने में तमाम तक़लीफ़ों की कबरगाह में से आज भी जैसे कोई प्रेतात्मा प्रश्न पूछ रही है कि तेरे ख्वाब कहाँ हैं, जो तूने देखे थे ? मैं कब्र देख कर फिर से हंस देता हूँ।
ashutosh ashutosh
Articles : 140
Since : 24/02/2009

Articles to discover

जाने क्यूँ आज माँ याद आई

जाने क्यूँ आज माँ याद आई

अकेला नितांत और भटक गया हूँ मैं, कोई साथी कोई दैत्य नहीं संग, रुझान और विचार कुछ शून्य सा है, मुझे सम्भालो इस धक्के से, जो अभी लगा ही नहीं
हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है

हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है

ऊफ़्फ़ हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है समतल सौंधा उबड़ खाबड़ गड्ड मड्ड सा उलझा प्यार आज भी है , हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है। थोड़ा नीरस थ
इतना ख़ामोश होके उलझाया मुझे

इतना ख़ामोश होके उलझाया मुझे

इतना ख़ामोश होके उलझाया मुझे, ज़िन्दगी तुझे ज़िन्दगी कहूँ क्या कहूँ ? फ़रेब जुगनुओं ने ही समझाया मुझे , रौशनी तुझे रौशनी कहूँ क्या कहूँ ? क्
सपने आसान क्यूँ नहीं होते?

सपने आसान क्यूँ नहीं होते?

हम सब लोग लगभग बचपन से ही अपने सुनहरे भविष्य की कच्ची कल्पना करने लगते हैं l और क्लास से कॉलेज तक आते आते हमें सपने ज्यादा स्पष्ट दिखने
स्वप्न तुम निराश ना होना

स्वप्न तुम निराश ना होना

स्वप्न तुम निराश ना होना रुकावटें आती हैं और आएँगी, मुश्किलें पथ पथ पर भरमाएँगी, मगर तुम हताश ना होना। स्वप्न तुम निराश ना होना। पाँव म
दिल के ज़ज्बात समेट कर

दिल के ज़ज्बात समेट कर

दिल के ज़ज्बात समेट कर, पूरी क़ायनात समेट कर मैं लौट आया फिर वही से, अपने हालात समेट कर। सज़दे सुबह और शाम को मुहब्बत के कैसे कैसे ? कभी कन्ध
गरीब

गरीब

पूरी दुनिया से सोच, तू अलेहदा क्यूँ हुआ ? ज़र्द ज़ज्बात में रंग सफ़ेदा क्यों हुआ ? अनाज़ और लंगोट का संगम नहीं तुझे, ऐ गरीब तू जहान में पैदा क्
छंद सा जीवन अनंदा

छंद सा जीवन अनंदा

छंद सा जीवन अनंदा मौत से सब काम धंधा, काही ले सुधि मोह माया शिव तले मोहे सब सुगंधा। अब कहाँ नीरस विषैला, है सुघड़ सुन्दर रसीला, काशी गंगा श

जीवन का संदर्भ खत्म है ,

जीवन का सन्दर्भ खत्म हैस्नेहों का पर्व खत्म है।उलझे धागे बिखरे पन्ने ,रिश्तों का गन्धर्व खत्म है। समझौतों को बेंच रहे सब।लिए पोटली अ