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ashutosh

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Friends, I am a person which belongs to typical Hindi reagon of Uttar Pradesh. Love & blesses for everyone, its only desire of me. Shayri, geet, ghazal whenever does come in heart beats, I try to wrote .
Associated tags : ghazals & shayari

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भावनाओ कि निर्मम हत्या से उपजी विचारों की अनुपम अभिव्यक्ति से दुनिया को जो मुर्दा दिखा वही कविता है। सीने में तमाम तक़लीफ़ों की कबरगाह में से आज भी जैसे कोई प्रेतात्मा प्रश्न पूछ रही है कि तेरे ख्वाब कहाँ हैं, जो तूने देखे थे ? मैं कब्र देख कर फिर से हंस देता हूँ।
ashutosh ashutosh
Articles : 145
Since : 24/02/2009
Category : Literature, Comics & Poetry

Articles to discover

दिल के ज़ज्बात समेट कर

दिल के ज़ज्बात समेट कर

दिल के ज़ज्बात समेट कर, पूरी क़ायनात समेट कर मैं लौट आया फिर वही से, अपने हालात समेट कर। सज़दे सुबह और शाम को मुहब्बत के कैसे कैसे ? कभी कन्ध
हताश

हताश

न कारवाँ न हमसफ़र , तन्हाई थी मेरी नज़र तन्हाई बस मेरी नज़र । मंजिल से भी अनजान था कुछ था तो वो सुनसान था कुछ था तो बस सुनसान था सेहरा को फिर र
गरीब

गरीब

पूरी दुनिया से सोच, तू अलेहदा क्यूँ हुआ ? ज़र्द ज़ज्बात में रंग सफ़ेदा क्यों हुआ ? अनाज़ और लंगोट का संगम नहीं तुझे, ऐ गरीब तू जहान में पैदा क्

शाकाहारी चिकन (हास्य व्यंग्य)

अब जब सावन खत्म हो गया है तो इस मसले पर भी चर्चा अहम हो जाती है कि चिकन शाकाहारी है या मांसाहारी - दो दिन तक चलने वाले इस महत्वपूर्ण चिंतन

कविता (थक गया हूँ मैं)

दौड़ते दौड़तेजब कहीँ नहीं पहुँचातो थक गया मैंनिडरता भी मेरे साथ साथ दौड़ रही थीलेकिन वो रास्ते मेंन जाने कहाँ पीछे रह गईशायद वो भी थक गई
सपने आसान क्यूँ नहीं होते?

सपने आसान क्यूँ नहीं होते?

हम सब लोग लगभग बचपन से ही अपने सुनहरे भविष्य की कच्ची कल्पना करने लगते हैं l और क्लास से कॉलेज तक आते आते हमें सपने ज्यादा स्पष्ट दिखने
हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है

हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है

ऊफ़्फ़ हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है समतल सौंधा उबड़ खाबड़ गड्ड मड्ड सा उलझा प्यार आज भी है , हे! प्रेयसी तेरा इंतज़ार आज भी है। थोड़ा नीरस थ

निशब्द

कब्र के नीचे दबा दिया है फिर भी अंदर इक चिंगारी सुलग रही है धीमे धीमे चूल्हे का ठंडा उपला हूँ फूंक तो मारो, सुलग उठूँगा धधक रहा हूँ धीमे

जीवन का संदर्भ खत्म है ,

जीवन का सन्दर्भ खत्म हैस्नेहों का पर्व खत्म है।उलझे धागे बिखरे पन्ने ,रिश्तों का गन्धर्व खत्म है। समझौतों को बेंच रहे सब।लिए पोटली अ

मित्र

हमको करते मिस नहीं,कइसन हो तुम तात ?आओ मिल बैठे पिये,हाला दिन और रात ।हाला दिन और रातकरें फिर मीठी बतियाँ,बहुत गए दिन मिली नहींमितरों से